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बासेल (स्विट्जरलैंड) : दो बार की रजत पदक विजेता पी वी सिंधू रविवार को आखिर में जब विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में अपना पहला स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहीं तो उनके पास अपनी खुशी बयां करने के लिये शब्द नहीं थे। सिंधू विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय हैं। उन्होंने एकतरफा फाइनल में अपनी चिर प्रतिद्वंद्वी जापानी खिलाड़ी नोजोमी ओकुहारा को 21-7, 21-7 से हराया। ठीक दो साल पहले ओकुहारा ने 110 मिनट तक चले बैडमिंटन के ऐतिहासिक मुकाबलों में से एक में सिंधू की स्वर्ण जीतने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था, लेकिन सिंधू आखिर में उसका बदला चुकता करने में सफल रही।

'मैं वास्तव में बहुत खुश हूं'

सिंधू ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘मैं वास्तव में बहुत खुश हूं। मुझे इस जीत का इंतजार था और आखिर में मैं विश्व चैंपियन बन गई।' उन्होंने कहा, ‘मेरे पास कहने के लिए शब्द नहीं है क्योंकि मैं मैंने लंबा इंतजार किया। पिछली बार मैंने रजत पदक जीता, उससे पहले भी मुझे रजत पदक से संतोष करना पड़ा था और आखिर में मैं विश्व चैंपियन बन गई। मैं वास्तव में बहुत खुश हूं। मैं लंबे समय से इसकी उम्मीद लगाए बैठी थी और आखिर में मैंने इसे हासिल किया और मैं इसका लुत्फ उठाना चाहती हूं। इसको महसूस करना चाहती हूं।'

सिंधू का यह विश्व चैंपियनशिप में पांचवां पदक है और इस तरह से महिला एकल में उन्होंने चीन की पूर्व ओलंपिक और विश्व चैंपियन झांग निंग की बराबरी की। सिंधू ने इससे पहले लगातार दो रजत और दो कांस्य पदक जीते थे। सिंधू ने रियो ओलंपिक खेल 2016 में भी रजत पदक जीता था। इसके अलावा उन्होंने गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेल और एशियाई खेलों में रजत पदक जीता था। वह पिछले साल विश्व टूर फाइनल्स में भी उप विजेता रही थी।

मां को समर्पित की जीत

सिंधू ने इस जीत का श्रेय अपने कोचों को दिया और इसे अपनी मां पी विजया को समर्पित किया। उन्होंने कहा, ‘‘मेरे कोचों गोपी सर (पुलेला गोपीचंद) और किम (जी ह्यून) को काफी श्रेय जाता। मेरे माता पिता, सहयोगी स्टाफ ओर प्रायोजकों को भी श्रेय जाता है जिन्होंने मुझ पर विश्वास दिखाया।' सिंधू ने कहा, ‘मैं यह जीत अपनी मां को समर्पित करती हूं। आज उनका जन्मदिन है। मैं उन्हें कोई उपहार देने के बारे में सोच रही थी और आखिर में मैं उन्हें यह स्वर्ण पदक उपहार में देती हूं। अपने माता पिता के कारण ही मैं आज यहां तक पहुंच पायी हूं।' जब सेंट जाकोबशेल स्टेडियम में भी भारतीय राष्ट्रगान बज रहा था तो सिंधू नम आंखों से पोडियम पर खड़ी थी। उन्होंने कहा, ‘यह वास्तव में विशेष क्षण था जब तिरंगा लहराया जा रहा था और राष्ट्रगान बज रहा था। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मेरे पास बयां करने के लिये शब्द नहीं है क्योंकि आप अपने देश के लिये खेलते हो और यह निश्चित तौर पर मेरे लिये गौरवशाली क्षण है।'

मैंने मैच पर ध्यान दिया फाइनल के बारे में नहीं सोचा 

सिंधू ने कहा कि उन्होंने फाइनल को किसी अन्य मैच की तरह ही लिया जिससे उन पर से दबाव हट गया और वह अपना सर्वश्रेष्ठ देने में सफल रही। उन्होंने कहा, ‘मैंने केवल अपने मैच पर ध्यान केंद्रित किया और यह नहीं सोचा कि यह फाइनल है। मैं केवल यह सोच रही थी कि यह अन्य मैच की तरह ही है जैसे कि मैं सेमीफाइनल और क्वार्टर फाइनल में खेली। मैंने यही तरीका अपनाया और अपना शत प्रतिशत दिया। जीत और हार बाद की बात है। मेरे लिये कोर्ट पर उतरकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना महत्वपूर्ण है।' 

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