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नई दिल्ली : लगातार चार ओलिम्पिक खेलों में भारतीय पुरुष हॉकी टीम का हिस्सा रहे दिग्गज स्ट्राइकर धनराज पिल्लई का मानना है कि टोक्यो में भाग्य मनप्रीत सिंह की अगुवाई वाली भारतीय पुरुष हॉकी टीम के साथ हो सकता है। 52 वर्षीय धनराज ने कहा कि हमारे पास 1992 से 2004 के बीच हर बार सर्वश्रेष्ठ टीम थी, लेकिन दुर्भाग्यवश हम शीर्ष स्थान पर खेल समाप्त नहीं कर सके। मुझे लगता है कि हमने हर ओलंपिक खेलों में यह गलती की थी कि हम मैच-दर-मैच लेने के बजाय फाइनल के लिए लक्ष्य बनाने के दिमाग में चले गए। 

टोक्यो ओलंपिक खेलों में 10 दिनों से भी कम समय बचा है। इस बीच हॉकी के दिग्गज खिलाड़ी धनराज ने हॉकी इंडिया की फ्लैशबैक सीरीज के ग्यारहवें लेख में 1992 में अपने पहले ओलंपिक खेलों के दिलचस्प और 2000 में सिडनी ओलंपिक में सेमीफाइनल बर्थ से चूक जाने के किस्से को याद किया है। 1989 में भारत के लिए पदार्पण करने के बाद बालकृष्ण सिंह द्वारा प्रशिक्षित 1992 के ओलंपिक टीम में चुने गए धनराज ने किस्से साझा करते हुए कहा कि मैं टीम में जूनियर था।

अजीत लाकड़ा और मैं शायद 1992 के बार्सिलोना ओलंपिक के लिए उस टीम में सबसे कम उम्र के खिलाड़ी थे। ओलिम्पिक में खेलना मेरा हमेशा से सपना था। इसके लिए मैंने वाकई बहुत मेहनत की। 1989 के बाद से लोग मुझे पहचानने लगे थे। 1989 में मैंने दिल्ली में एशिया कप खेला (जहां भारत ने रजत जीता) और उसके बाद हम हॉलैंड गए, जहां मैंने सच में छाप छोड़ी। हमने पाकिस्तान को 4-2 से हराया, यह मेरे लिए एक अच्छा टूर्नामेंट था और वहां से मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

52 वर्षीय धनराज ने कहा कि मैंने राइट-आउट और सेंटर फॉरवर्ड खेला। मैंने जूड (फेलिक्स) को बहुत देखा। वह बहुत ही स्टाइलिश खिलाड़ी थे, मैं भारतीय टीम में आने से पहले उनका खेल देखता था। जूड दक्षिण रेलवे के लिए खेलते थे और ऐसे महान खिलाड़यिों से युक्त भारतीय टीम का हिस्सा बनना एक शानदार अनुभव था। परगट बहुत सख्त कप्तान थे और अभ्यास के दौरान हमेशा गंभीर रहते थे। कई बार ऐसा भी होता था कि अगर हम सुस्त पड़ते तो वह हमें डांट भी देते थे।

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