अंबिकापुर : जम्मू-कश्मीर के पहलवान Hamam Hussain की कहानी मेहनत, संघर्ष और सपनों की मिसाल है। जब वह कुश्ती की प्रैक्टिस नहीं कर रहे होते, तब अपने बड़े भाई के साथ घर-घर दूध पहुंचाने का काम करते हैं। पिता की पांच साल पहले मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी दोनों भाइयों पर आ गई थी, जिसके बाद उनके बड़े भाई को कुश्ती छोड़कर दूध बेचने का काम करना पड़ा।
14 साल की मेहनत के बाद मिला पहला गोल्ड
हमाम हुसैन ने आखिरकार खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में पुरुष 79 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में गोल्ड मेडल जीतकर अपने 14 साल के करियर का पहला राष्ट्रीय स्वर्ण पदक हासिल किया। फाइनल में उन्होंने हिमाचल प्रदेश के मोहित कुमार को हराकर यह उपलब्धि हासिल की। यह जीत उनके लंबे संघर्ष और मेहनत का नतीजा है।
गांव से 40 किमी दूर जाकर करते हैं प्रैक्टिस
सीमित सुविधाओं के बावजूद हमाम ने कभी हार नहीं मानी। वह अपने गांव से करीब 20 किलोमीटर दूर मिट्टी के अखाड़े में अभ्यास करते हैं और मैट प्रैक्टिस के लिए लगभग 40 किलोमीटर दूर जम्मू जाना पड़ता है। इतनी कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने सपने को जिंदा रखा और लगातार मेहनत करते रहे।
बिना पर्सनल कोच के की तैयारी
हमाम के पास कोई पर्सनल कोच नहीं है। गांव के अखाड़े में सीनियर पहलवान ही उन्हें ट्रेनिंग देते हैं और जब वह मैट पर प्रैक्टिस करने जाते हैं, तब वहां कोच की मदद मिलती है। उनका कहना है कि गांवों में खिलाड़ियों को शहरों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं, लेकिन अगर बेहतर सुविधाएं मिलें तो उनके क्षेत्र के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा मेडल जीत सकते हैं।
गोल्ड मेडल नहीं, मेहनत की जीत
हमाम हुसैन इस गोल्ड मेडल को सिर्फ एक पदक नहीं बल्कि अपनी वर्षों की मेहनत और संघर्ष का परिणाम मानते हैं। उन्होंने कहा कि वह ऐसे इलाके से आते हैं जहां कुश्ती के लिए ज्यादा सुविधाएं नहीं हैं, इसलिए उन्हें लंबी दूरी तय करके अभ्यास करना पड़ता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगर ऐसे टूर्नामेंट आगे भी होते रहे तो उनके जैसे खिलाड़ी देश के लिए और मेडल जीत सकते हैं।