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श्रीनगर : अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने कश्मीरी विलो से बने क्रिकेट बैट के उपयोग को मंजूरी दे दी है। इसके लिए 29 वर्षीय फौजुल कबीर ने लगातार डेढ़ साल का अथक प्रयास किया। उनके जीवन का भावनात्मक क्षण उस समय आया जब कश्मीरी विलो,‘सेलिक्स अल्बा' लकड़ी से बने उनके बल्ले ओमान के दो खिलाड़यिों नसीम खुशी और बिलाल खान द्वारा अक्टूबर 2021 में दुबई क्रिकेट स्टेडियम में बांग्लादेश के खिलाफ टी 20 विश्व कप मैच के दौरान इस्तेमाल किए गए थे। 

अवंतीपोरा में इस्लामिक यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स करने वाले और स्ट्रेटिजिक मैनेजमैंट में पीएचडी कर रहे कबीर ने अपने पिता अब्दुल कबीर की मृत्यु के बाद सात साल से अधिक समय तक लड़ाई लड़ी, जिन्होंने अनंतनाग के संगम में जीआर 8 स्पोट्र्स मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की स्थापना की। उन दिनों को याद करते हुए जब दुबई में‘मेड इन कश्मीर'क्रिकेट उत्पादों का इस्तेमाल किया जा रहा था। कबीर ने कहा, 'यह न केवल मेरे लिए बल्कि पूरे कश्मीर के लिए एक भावनात्मक क्षण था।' 

उन्होंने कहा कि आईसीसी द्वारा उत्पादों को पंजीकृत कराने के लिए, 'हमें उनकी शर्तों को पूरा करने के लिए अपनी पूरी निर्माण प्रक्रिया जमा करनी थी।' इसमें बल्ले के बारे में सब कुछ- आकार, हैंडल, मोटाई और चौड़ाई शामिल थे, इनको अंतरराष्ट्रीय मानकों पर तैयार करना था। उन्होंने कहा, 'हम इन सभी को मंजूरी के लिए अपने वक्ताओं के साथ दुबई आईसीसी मुख्यालय ले गए। एक बार जब आप आईसीसी से अनुमति प्राप्त कर लेते हैं, तो आपके ब्रांड का उपयोग दुनिया में कोई भी नहीं करेगा और कोई भी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हमारे उत्पादों का उपयोग कर सकता है।' 

कबीर ने कहा कि ओमान के नसीम खुशी और बिलाल खान कश्मीर में बने बल्ले से खेलकर काफी खुश थे। उन्होंने कहा, 'ओमान टीम के खिलाड़ियों ने 2021 में टी 20 के दौरान न केवल हमारे बल्ले का इस्तेमाल किया बल्कि हमारे हेलमेट, ग्लवस और पैड भी पहने थे।' उन्होंने कश्मीरी विलो के 60 बल्लों और अन्य वस्तुओं के लिए एक ऑडर्र दिया था, जिसे हम कुछ ही दिनों में पार्सल करने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि दुबई में विश्व कप के दौरान पाकिस्तानी क्रिकेट गेंदबाज शादाब खान और हसन अली ने भी उनसे संपर्क किया और जीआर8 कश्मीर विलो बैट का इस्तेमाल करने की इच्छा व्यक्त की। 

‘बांग्लादेश, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, स्कॉटलैंड और ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी पहले ही हमसे बल्ले के लिए संपर्क कर चुके हैं। हम उनके ऑडर्र तैयार कर रहे हैं।' कबीर ने कहा कि क्रिकेट के बल्ले आमतौर पर केवल दो जगहों इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में बनते हैं। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका में भी बल्ले बनते हैं लेकिन वह इंग्लैंड से लकड़ी आयात करते हैं। उन्होंने कहा कि सलामी बल्लेबाजों, मध्यक्रम के बल्लेबाजों और हाडर् हिटरों के लिए क्रिकेट के बल्ले अलग होते हैं। इसी तरह, कठिन और धीमी पिचेों के लिए भी विभिन्न प्रकार के बल्ले बनाए जाते हैं। 

दक्षिण एशिया में में सियालकोट, रावलाकोट और कश्मीर के अन्य हिस्से की लकड़ी का उपयोग करके पाकिस्तान में भी बल्ले बनाए जाते हैं। भारतीय कश्मीर में क्रिकेट के बल्ले बनाने वाली लगभग 400 इकाइयां हैं। इसके अलावा पंजाब के जालंधर और उत्तर प्रदेश के मेरठ में एजेंटों को भी कच्चा माल बेचते हैं जो अपने नाम पर उत्पाद बेचते हैं। कबीर ने कहा कि अपने पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने और उनके भाई नियाज-उल-कबीर ने ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और खाड़ी देशों सहित क्रिकेट खेलने वाले देशों का दौरा किया, लेकिन ऑडर्र हासिल नहीं कर सके। हर जगह को लोगों ने कहा कि कश्मीर विलो केवल गली क्रिकेट के लिए है। 

कश्मीरी विलो की पहचान बनाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में धूम मचाने में सात साल लग गए। कबीर ने कहा कि उन्होंने अपने प्रचार के लिए ओमान, स्कॉटलैंड, नीदरलैंड और नामीबिया से भी संपर्क किया। इसके बाद कई खिलाड़ियों ने अपनी रुचि दिखाई है और अपने ऑडर्र दिए हैं। उन्होंने कहा कि वे भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों के प्रमोशन का खर्चा नहीं उठा सकते, क्योंकि वह करोड़ों रुपये की मांग रहे हैं। उन्होंने कहा, 'हमें भारतीय राज्यों से पर्याप्त ऑडर्र मिल रहे हैं।' कबीर की कंपनी को दुबई के 150 स्कूलों और क्रिकेट अकादमियों से भी बड़ा ऑडर्र मिला है। 

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