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स्पोटर्स डेस्क (अतुल वर्मा): कभी महज 13 साल की उम्र में चोटों ने उनका रास्ता रोका तो कभी 21 साल की उम्र में, लेकिन बैडमिंटन के खेल को लेकर उनके जुनून, जोश और लगन ने उन्हें आज “गुरु गोपी” का सम्मान दिलवा दिया है। भारतीय बैडमिंटन के द्रोणाचार्य कहे जाने वाले पुलेला गोपीचंद का आज जन्मदिन है और वो आज 44 साल के हो गए हैं। 16 नवंबर 1973 को आंध्र प्रदेश के नागंदला में जन्में गोपीचंद का एक बेहतरीन बैडमिंटन खिलाड़ी से “गुरु गोपी” बनने तक का सफर वाकई शानदार रहा है। चलिए, आपको बताते हैं।

बचपन से था बैडमिंटन चैंपियन बनने का जज्बा

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पुलेला गोपीचंद में बचपन से चैंपियन बनने का जज्बा था। 13 साल की उम्र में मांसपेशियों की आई चोट भी उन्हें बैडमिंटन के क्षेत्र में आगे बढ़ने से नहीं रोक पाईं। एक कार्यक्रम में गोपीचंद ने कहा था, कि बचपन में मैं और मेरा भाई दोनों बैडमिंटन खेलते थे, लेकिन मुझे लगता है कि मेरी किस्मत अच्छी थी, क्योंकि मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था। उन्होंने बताया कि मेरा भाई पढ़ाई में अच्छा था और IIT का एग्जाम पास किया, जिसके बाद उनके भाई का खेल छूट गया और पढ़ाई में अच्छा ना होने के कारण उनका बैडमिंटन पर ही फोकस रहा और वो आज यहां तक पहुंचे हैं।

23 की उम्र में था ऐसा जज्बा कि 5 साल तक जीतते ही रहे

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13 साल की उम्र में चोटों से उबरने के बाद 21 साल की उम्र में भी उनके साथ एक हादसा हुआ था। बैडमिंटन के कोर्ट पर हादसे ने उनके करियर पर करीब-करीब फुल-स्टाप लगा ही दिया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और चोट से उभर कर 23 साल की उम्र में कोर्ट पर वापस आए और नेशनल चैंपियनशिप जीती। इसके बाद वो अगले 5 साल तक एक के बाद एक जीत दर्ज करते चले गए।

ऑल इंग्लैंड टूर्नामेंट जीतने वाले बने थे दूसरे भारतीय खिलाड़ी

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साल 2001 में गोपीचंद भारत के जाने-माने बैडमिंटन खिलाड़ी रहे प्रकाश पादुकोण के बाद ऑल इंग्लैंड टूर्नामेंट जीतने वाले दूसरे भारतीय खिलाड़ी बने थे। इस दौरान वो इतनी जबरदस्त फॉर्म में थे कि उन्होंने वर्ल्ड नंबर-1 पीटर गेड और अपने से ऊपर रैंक वाले चीन के चेंग हॉन्ग को भी हरा दिया था। अपने करियर में उन्होंने ऑल इंग्लैंड समेत 5 इंटरनेशनल खिताब जीते

बैडमिंटन एकेडमी खोलने के लिए गिरवी रख दिया था अपना घर

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साल 2004 में खिलाड़ी से कोच बने गोपीचंद ने बैडमिंटन एकेडमी खोलने की सोची। भारत को बैडमिंटन के एवरेस्ट पर पहुंचाने की सोच रखकर चले गोपीचंद के सामने चुनौतियां बहुत थी, एकेडमी खोलने की राह आसान नहीं थी, एकेडमी खोलने के लिए उन्होंने अपना घर तक गिरवी रख दिया था, लेकिन उन्होंने यहां भी हार नहीं मानी और भारत के युवा खिलाड़ियों के लिए इसी साल बैडमिंटन एकेडमी की शुरुआत की।

साल 2009 में पुलेला गोपीचंद को मिला था द्रोणाचार्य अवॉर्ड

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बता दें कि गोपीचंद को साल 2009 में द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। द्रोणाचार्य सम्मान हासिल करने के बाद एक सवाल के जवाब में उन्होंने अपनी अकादमी के बारे में कहा था, कि “शुरुआत में एकेडमी खोलने या ना खोलने को लेकर कई सवाल थे कि कामयाबी मिलेगी या नहीं, लेकिन मैंने अपना बेस्ट दिया। वो वाकई मुश्किल दिन थे, लेकिन मैं खुश हूं कि मेहनत रंग लाई है”।

गोपीचंद की एकेडमी से ही निकले हैं साइना, सिंधु और श्रीकांत

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साइना नेहवाल, पीवी सिंधु, किदांबी श्रीकांत, पुरुपल्ली कश्यप, समीर वर्मा, एचएस प्रणॉय समेत कई अन्य खिलाड़ी गोपीचंद की एकेडमी से ही मंझकर बैडमिंटन की दुनिया में छाए हैं। बता दें कि 2012 में साइना नेहवाल लंदन ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल और 2016 में पीवी सिंधु रियो में भारत के लिए सिल्वर मेडल जीत चुके हैं।

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