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स्पोर्ट्स डेस्क(राहुल): भारत में खेलों व खिलाड़ियों की कमी नहीं है, लेकिन इस बात की कमी जरूर है कि यहां सिर्फ एक ही खेल यानी क्रिकेट को ज्यादा महत्व दिया जाता है जिसके कारण कई नामी एथलीट गु्मनाम हो जाते हैं आैर कई खेल नजरअंदाज। गलती सिस्टम की है ही, लेकिन लोगों में क्रिकेट के अलावा किसी आैर खेल के प्रति लगाव ना होना चिंता का विषय बना हुआ है। एशियाई खेलों में खिलाड़ियों ने पिछले 67 वर्षों से अबकी बार अपना सर्वश्रेष्ठन प्रदर्शन दिया। 2010 में हुए एशियाई खेलों में 14 गोल्ड, 17 सिल्वर आैर 34 ब्राॅन्ज के साथ कुल 65 पदक जीते थे, लेकिन इस बार खिलाड़ियों ने भारत की झोली में 15 गोल्ड, 24 सिल्वर, 30 ब्राॅन्ज के साथ कुल 69 मेडल डालकर अबतक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। युवा खिलाड़ियों ने कड़ी मेहनत आैर बुरे वक्त से निकलर मेडल जीते, पर बावजूद इनके उन्हें वो सम्मान नहीं मिलता जो एक भारतीय क्रिकेटर को सीरीज जीतने के बाद मिलता है या फिर यह कहें कि मात्र 1 मैच जीतने पर। 

क्रिकेट के प्रति गंभीर, लेकिन अन्य खेलों के प्रति नहीं
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देश में ऐसा माहाैल बन चुका है कि सरकार भी क्रिकेट के प्रति गंभीर है, लेकिन अन्य खेलों में मेडल लाने वाले खिलाड़ियों के प्रति गंभीर नहीं। ताजा उदाहरण आप क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के रूप में ही ले लीजिए। धोनी कुछ दिन पहले एक एड की शूटिंग के लिए 'देवभूमि' हिमाचल में आए। उनकी सुरक्षा के लिए राज्य सरकार ने उन्हें 5 दिनों के लिए राज्य अतिथि की तरह सुविधाएं उपलब्ध कराईं। वहीं जब महिला कुश्ती की गोल्ड विजेता विनेश फोगाट स्वदेश लाैटीं तो उन्हें सरकार या प्रशासन की ओर से कोई सम्मान नहीं मिला। विनेश के परिवार ने भी इसपर हैरानी जताई कि जिस लड़की ने गोल्ड जीतकर देश का नाम राैशन किया उसके आने पर वो सम्मान नहीं मिला जिसकी वो हकदार थी। आपको बता दें कि विनेश पहली महिला हैं, जिन्होंने एशियाई खेलों में कुश्ती की प्रतियोगिता में भारत के लिए गोल्ड में जीता हो। 

वहीं अब क्रिकेटरों को मिलने वाले सम्मान पर थोड़ा विचार करें। विदेश में कहीं भी टूर्नामेंट हो, अगर टीम जीतकर आती है तो क्रिकेटरों समेत पूरे स्टाफ का एयरपोर्ट, बस स्टैंड या फिर रेलवे स्टेशन(जहां भी मिलें) पर पूरा सम्मान किया जाता है। यहां तक कि उनके गले में फूलों की माला डालकर राज तिलक की प्रथा तक भी निभाई जाती है। ऐसे सरकार को ध्यान रखना जरूरी है कि वह सिर्फ क्रिकेट को ही खेल का प्रधान ना बनाएं, बल्कि अन्य खेलों आैर खिलाड़ियों में भी अपनी रूचि दिखाएं जहां के खिलाड़ी छोटे कस्बों आैर गरीबी से निकलकर अपनी किस्मत अाजमाते हैं। 

घर की मरम्मत भी नहीं करवा सकता एथलीट
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अब बारी आती है क्रिकेट आैर अन्य खेलों के खिलाड़ियों की कमाई की। अगर एक क्रिकेटर 1 सीरीज खेल लेता है तो वह आराम से लग्जरी कार खरीदने के योग्य हो जाता है, लेकिन अन्य खेलों के खिलाड़ियों को जीत पर मिलता है सिर्फ छोटा सा सहारा। यानी कि 4 साल की कड़ी मेहनत के बाद सरकार से दो शब्द तारीफ या फिर मात्र 10 लाख। हेप्टाथलान स्पर्धा में स्वप्ना बर्मन ने पश्चिम बंगाल के लिए गोल्ड मेडल जीता। उनके इस कारनामे के बाद पूरा देश खुशी से झूम उठा, लेकिन स्वप्ना को अपने राज्य से वो नहीं मिल सका जिसकी उसे उम्मीद थी। छोटे से गांव आैर गरीबी से निकली स्वप्ना के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सिर्फ 10 लाख की घोषणा की। लेकिन शायद राज्य सरकार यह भूल गई कि 10 लाख की रकम स्वप्ना के सपने पूरे नहीं सकते। यहां तक कि वो अपने उस टूटे-फूटे घर की मरम्मत भी नहीं कर सकती, जहां रहकर वह अपना जीवन बीता रही है। 

क्रिकेट से नहीं हो सकती सोना, चांदी की तुलना
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सच तो यह है कि सोना, चांदी लाने वाले खिलाड़ियों की तुलना क्रिकेट से हो ही नहीं सकती। ऐसा नहीं है कि ये खिलाड़ी क्रिकेटर नहीं बनना चाहते, लेकिन महंगी किट आैर निवेश के कारण इन्हें अपना लक्ष्य बदलना पड़ा। हम यह कहें कि जो फर्क आज गांवों आैर शहरों के बीच है, वो फर्क क्रिकेट आैर अन्य खेलों के बीच भी हैै। क्रिकेट मैट्रो सिटी की तरह है वहीं बाकी खेल गांवों की तरह जहां ना बिजली, ना पानी आैर ना सड़क है।

1.78 करोड़ की आबादी 135 करोड़ पर क्यों पड़ी भारी
एशियाई खेलों में भारत ने भले अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया। अगर सरकार इन खिलाड़ियों पर शुरू में ही ध्यान देती आैर सबकी नजर क्रिकेट से हटकर इन खिलाड़ियों पर पड़ती तो हो सकता था कि परिणाम आैर भी बेहतर मिलते। मैडल टैली में भारत 8वें स्थान पर रहा, जबकि कज़ाख़िस्तान 9वें नंबर पर, लेकिन आप यह जानकर हैरान होंगे कि कज़ाख़िस्तान ने भारत से ज्यादा 76 मेडल जीते हैं। हैरानी इसलिए, क्योंकि कज़ाख़िस्तान की आबादी 1.78 करोड़ है तो भारत की 135 करोड़, फिर हम इतने पीछे क्यों? कज़ाख़िस्तान आखिर कैसे 15 गोल्ड लेकर भारत की बराबरी कर गया? कहीं इसका कारण देश में एथलीटों को प्रोत्साहन का ना मिलना तो नहीं। खैर, सरकार आैर खेल संस्थाओं को खिलाड़ियों की मदद आैर उन्हें आगे लाने की जरूरत है जो बीना जूते पहने रेस ट्रैक पर दाैड़ते हैं। 

क्रिकेटरों को मिलता इतना पैसा तो हाॅकी में सिर्फ इतना
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एक भारतीय क्रिकेटर को 1 टी20 मैच खेलने का 3 लाख, वनडे खेलने का 7 आैर टेस्ट खेलने का 15 लाख मिलता है आैर ए ग्रेड में सालाना 7 करोड़ दिया जाता है। वहीं नेशनल गेम हाॅकी में खिलाड़ियों को सालाना 15 लाख मिलते हैं। मतलब यह हुआ कि एक क्रिकेटर अगर 4 साल तक लगातार क्रिकेट खेल ले तो वह करोड़ों पैसा कमाकर आराम की जिंदगी जी सकता है। वहीं दूसरी तरफ एथलीट हैं, जिन्हें 4-4 साल तक कड़ी मेहनत करने के बावजूद भी वो हासिल नहीं हो पाता जिसकी उन्हें उम्मीदें होती है। हालांकि हरियाणा सरकार जरूर खिलाड़ियों को मेडल जीतने पर करोड़ों रूपए देती है, लेकिन कई राज्य ऐसे हैं जहां खिलाड़ी तो हैं पर उन्हें सरकार से मदद नहीं मिल पाती। इसके उदाहरण हैं भारतीय एथलीट तेजिंदर पाल सिंह तूर। पंजाब के रहने वाले तूर ने भाला फेंक में गोल्ड मेडल जीता। यह पंजाब के लिए एक गाैरव की बात थी पर यहां की सरकार के लिए तूर द्वारा गोल्ड जीतना कोई बड़ी बात नहीं। लिहाजा तूर ने अब राज्य सरकार से उम्मीदें ही छोड़ दीं। 

विज्ञापन में क्रिकेट पड़ता है सब पर भारी
भारत में क्रिकेट का क्रेज इतना बढ़ चुका है कि इसके बड़ी-बड़ी कंपनिया नामी क्रिकेटरों के साथ करोड़ों का कांट्रैक्ट आैर विज्ञापन करती हैं। यही कारण है कि विज्ञापन में क्रिकेट बाकी खेलों पर भारी पड़ता है। साल 2017 में क्रिकेटर्स को विज्ञापन के जरिए 323 करोड़ की कमाई हुई। वहीं अन्य खेलों के एथलीट को कुल 73 करोड़ की कमाई हुई। इन आंकड़ों से साफ नजर आता है कि हमारे देश में क्रिकेट को ही ज्यादा तवज्जो दी जाती है, ना की अन्य खेलों को।

10 राज्यों में खिलाड़ियों को मेडल लाने पर नौकरी की गारंटी नहीं
कुछ राज्य ऐसे हैं जो अपने खिलाड़ियों को मेडल लाने पर सरकारी नाैकरी के साथ करोड़ों रूपए देने का ऐलान करती हैं, तो वहीं 10 ऐसे राज्य भी हैं जहां नाैकरी की कोई गारंटी नहीं। ये 10 राज्य हैं- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, सिक्कम, नगालैंड, गोवा, त्रिपुरा, बंगाल और मणिपुर।
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ये राज्य नौकरी के साथ देते हैं प्राइज मनी
हरियाणा- गोल्ड जीतने पर 3 करोड़ और क्लास वन की नौकरी, सिल्वर जीतने पर 1.5 करोड़ और क्लास-2 की नौकरी, कांस्य जीतने पर 75 लाख और क्लास-3 की नौकरी. 
असम- गोल्ड पर 50 लाख, सिल्वर पर 30 लाख और कांस्य पर 20 लाख और सभी को क्लास-2 की नौकरी
गुजरात- गोल्ड पर 2 करोड़, सिल्वर पर 1 करोड़ और कांस्य पर 50 लाख रुपये. गोल्ड को क्लास-1 और बाकी को क्लास-2 की नौकरी।
महाराष्ट्र- गोल्ड-10 लाख, स्वर्ण-7.5 लाख और कांस्य-5 लाख। नौकरी सबको योग्यता के मुताबिक।

2 राज्यो में केवल नौकरी 
उत्तर प्रदेश में सभी को क्लास-2 और कर्नाटक में सभी को क्लास-1 की नौकरी दी जाती है। इसके अलावा राज्‍य सरकार की ओर से पदक विजेताओं को नकद राशि देने की घोषणा भी की जाती है।
 


 

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