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जालन्धर (जसमीत सिंह) : 2018 की गोल्डकोस्ट कॉमनवैल्थ गेम्स में अब तक भारत की शुरुआत शानदार रही है। भारत को गेम्स का पहला पदक पी गुरुराजा ने वेट लिफ्ंिटग के 56 किलोग्राम वर्ग में दिलाया। उसके बाद इंफाल की जन्मी मीराबाई चानू ने 48 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड जीता। गेम्स के दूसरे दिन संजीता चानू ने 53 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड जीता तो वहीं, महज 18 साल की उम्र में दीपक लाठेर ने 69 किलोग्राम वर्ग में ब्रॉन्ज जीत भारत के मैडलों की संख्या 4 कर दी। बता दें कि अब तक भारत के चारों पदक वेटलिफ्टिंग से आए ही हैं। इसके अलावा भी चारों पदक विजेता में एक ऐसी कॉमन बात भी है जिसने इन्हें सफलता के शिखर तक पहुंचाया।

मीराबाई चानू : जज्बे से जीती दुनिया
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48 किग्रा में स्नैच, क्लीन एंड जर्क में भारत के लिए पहला गोल्ड लाने वाली मीराबाई चानू कभी वेटलिफ्टर न बन पाती अगर वह भाई के उक्साने पर विरोध स्वरूप कदम न उठाती। दरअसल इम्फाल से 20 किमी दूर नोंगपोक काकचिंग गांव में गरीब परिवार में जन्मी मीरा जब 12 साल की तब वह अपने छह भाई-बहनों के साथ पहाड़ी पर लकड़ी बीनने जाती थी। एक दिन मीराबाई से चार साल बड़े भाई सांतोम्बा ने उसे कहा कि वह थक गया है। लकड़ी नहीं उठा पाएगा। रुक जाते हैं। मीरा ने खुद लकड़ी उठाने की बात कही तो सांतोम्बा ने उन्हें रोक दिया। मीरा को इससे बुरा लगा। उन्होंने इसे चैलेंज माना और लकडिय़ां का गट्ठा उठाकर अपने सिर पर रख लिया। बकौल सांतोम्बा- मीरा को उस दिन देख मैं संतब्ध रह गया था। वह अपने सिर पर लकड़ी का गट्ठा उठाकर दो किलोमीटर तक चली। रास्ते में मैं उससे बार-बार गट्ठा देने को कहता रहा लेकिन जज्बे से भरी मीरा ने ऐसा नहीं किया। मुझे आज फख्र है कि उसने दुनिया जीत ली है।

पी. गुरुराजा : कोच पर विश्वास कर पाई सफलता
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गेम्स में पदार्पण कर रहे 25 साल के गुरुराजा ने 56 किलो वर्ग मुकालबे में 249 किलो (111 और 138) वजन उठाकर सिल्वर मेडल जीता। जीत से उत्साहित गुरुराजा ने कहा कि मुझे देश के लिए सिल्वर मेडल जीतने की खुशी है। हालांकि यह प्रदर्शन मेरे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन क आसपास भी नहीं है। लेकिन मैं मैडल ला पाया इसकी संतुष्टि है। गुरुराजा ने कहा- अगर वह जीत पाए तो इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ उनके कोच का है। दरअसल गुरुराजा का बचपन से सपना था कि वह बड़ा होकर पहलवान बने। इसके लिए वह नियमित अभ्यास भी करते थे। उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब वेटलिफ्टिंग कोच ने उन्हें पहलवानी छोड़ वेटलिफ्टिंग में आने की सलाह दी। गुरुराजा ने कहा कि उनका इरादा पहलवानी छोडऩे का नहीं था। लेकिन कोच सर का उनपर जो विश्वास था- वह उसे टूटने नहीं देना चाहते थे। उन्हें लगा कि कोशिश करने में कुछ बुरा नहीं है। लेकिन जैसे-जैसे मैं गेम्स में अभ्यास बढ़ाने लगा, मेरी रुचि इसमें बढऩे लगी। आज मैं कॉमनवैल्थ में मेडल जीत चूका हूं। खुश हूं कोच पर विश्वास कर मैंने जो वेटलिफ्टिंग चुनी वह बिल्कुल सही फैसला था।

दीपक लाठेर : पिता की आज्ञा मानी, बन गया चैंपियन
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18 साल के दीपक लाठेर ने पुरुषों की वेटलिफ्टिंग स्पर्धा के 69 किलोग्राम भारवर्ग में भारत को ब्रॉन्ज मेडल दिलाया। दीपक ने स्नैच में 136 किलोग्राम तो क्लीन एंड जर्क में 159 किलोग्राम भार उठाया। लाठेर पदक के पक्के दावेदारों में से एक थे। उन्होंने 15 साल की उम्र में नैशनल रिकॉर्ड (62 किग्रा. वर्ग में 126 किलोग्राम की स्नैच) ध्वस्त किया था। लाठेर हरियाणा के रोहतक जिले के गांव शादीपुर का रहने वाला है। उनके पिता बिजेंद्र लाठेर ने बताया कि उन्हें पता था कि बेटा एक दिन खेलों में उनका नाम रौशन करेगा। लाठेर के मुताबिक- दीपक जब छोटा था तो चारे की बोरियां अपनी पीठ पर लादकर ले जाता था। वह तब नौ साल का था जब अपनी थकी मां को पीठ पर लादकर घर ले आया था। वह बेटे की ताकत से हैरान थे। उन्होंने उसे आर्मी इंस्टीट्यूट में भेजा ताकि उसकी ताकत का देश का फायदा हो। लाठेर मुताबिक- पहले दीपक इसके लिए राजी नहीं था। लेकिन मनाने पर वह मान गया। आर्मी स्पोट्र्स इंस्टीट्यूट ने पहले उसे ड्राइवर बनने की ट्रेंनिग दी गई। इसी दौरान आर्मी के कोचों ने दीपक की प्रतिभा पहचान उसे वेटलिफ्टिंग टीम में शामिल कर लिया। आज दीपक ने अपने परिवार का नाम दुनिया में रौशन किया है। अगर दीपक ने बचपन में पिता की आज्ञा मानकर आर्मी इंस्टीट्यूट जॉइंन न किया होता तो शायद कभी वह सफलता की सीढिय़ां नहीं चढ़ पाता।

संजीता चानू : जिद ने किया था हैरान, आज खुद को किया साबित
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मीराबाई चानू के बाद मणिपुर की संजीता चानू ने भी 53 किलोग्राम वर्ग में 84 किलोग्राम स्नैच  और 108 किलोग्राम क्लीन एंड जर्क में वजन उठाकर गोल्ड जीता। संजीता ने चार साल पहले भी ग्लास्गो कॉमनवैल्थ में गोल्ड जीता था। संजीता ने तब 42 किलोग्राम कैटेगरी में गोल्ड जीता था। कुंजारानी देवी को अपना आदर्श मानने वाली स्वभाव से चाहे शर्मीली हों लेकिन अर्जुन पुरस्कार न मिलने पर कोर्ट में जाने के उनके कार्य ने सभी को हैरान कर दिया था। हालांकि तब उन्हें अर्जुन पुरस्कार नहीं मिला। लेकिन इस साल उन्होंने कॉमनवैल्थ गेम्स में गोल्ड जीतकर बता दिया है कि अगले साल उन्हें अर्जुन पुरस्कार मिलने से कोई रोक नहीं सकता। यकीनन संजीता ने कामयाबी की दास्तां लिखकर न सिर्फ दुनिया को हैरान किया है बल्कि उसने जो जिद की उसे साबित भी कर दिखाया।

दो शब्द : उपरोक्त चारों खिलाडिय़ों की जिंदगी में एक बात कॉमन है, सभी की जिंदगी बेहद साधारण थी। उन्होंने अपने खेल जीवन में सफलता के चार नियम- जिद, विश्वास, समर्पण और जज्बे पर चलना जारी रखा। यह चारों नियम इन पदक विजेताओं की कहानियों में कहीं न कहीं झलक दिखाते हैं। यह आगे भी ऐसे ही प्रदर्शन करें, इसकी कामना करते हैं।

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