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इंटरनेशनल डेस्क: पाकिस्तान अपने बढ़ते ऋण का भुगतान करने के लिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पी.ओ.के.) का गिलगित-बाल्तिस्तान (जी.बी.) चीन को सौंप सकता है। काराकोरम नैशनल मूवमैंट के अध्यक्ष मुमताज नगरी ने कहा कि अलग-थलग और उपेक्षित गिलगित-बाल्तिस्तान विश्व शक्तियों के लिए प्रतिस्पर्धा करने को भविष्य का युद्ध का मैदान बन सकता है। कश्मीर का सबसे उत्तरी भाग चीन की सीमा से लगा हुआ है और नगरी ने आशंका व्यक्त की है कि पाकिस्तान जी.बी. चीन को सौंप सकता है। पाकिस्तानी मीडिया में आई खबरों में कहा गया है कि नगरी लोगों को उत्तेजित कर रहे हैं और उनसे कहा जा रहा है कि आई.एस.आई. से न डरें और जेल जाने के लिए तैयार रहें।

पाकिस्तान जिस जी.बी. को अवैध रूप से अपने कब्जे में रखे हुए है, वह चीन के दक्षिण एशियाई विस्तार के लिए वरदान साबित हो सकता है। चीन ने उस क्षेत्र का उपयोग किया है जिसे पाकिस्तान ने पहले सौंप दिया था और अब वह जी.बी. भी चाहता है क्योंकि काराकोरम चीन-पाकिस्तान आॢथक गलियारे (सी.पी.ई.सी.) के मार्ग में है। इस तरह के किसी भी कदम से पाकिस्तान को पट्टे पर मोटी रकम मिल सकती है जो उसके मौजूदा आॢथक संकट से निकलने में मदद कर सकती है परंतु यह कदम अमरीका को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) से 3 अरब अमरीकी डॉलर की सहायता से इंकार करने या देरी करने के लिए भी विवश कर सकता है। इस कदम से पाकिस्तान को आई.एम.एफ., विश्व बैंक और अन्य वैश्विक एजैंसियों से धन प्राप्त करने के लिए ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है।

पाक पर है 42.9 ट्रिलियन 
पाकिस्तानी रुपए का ऋण

मार्च 2022 तक पाकिस्तान का सार्वजनिक ऋण 42.9 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपए (248.7 बिलियन अमरीकी डॉलर) के आसपास था जो पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का 80.2 प्रतिशत है जिसमें से घरेलू ऋण 28.0 ट्रिलियन है जबकि बाहरी ऋण 14.9 ट्रिलियन (86.4 बिलियन अमरीकी डालर) है।

गिलगित-बाल्तिस्तान भारत में होता तो अमरीका को अफगानिस्तान में लाभ होता
अमरीकी कांग्रेस के बॉब लैंसिया का मानना है कि यदि गिलगित-बाल्तिस्तान भारत में होता और बलूचिस्तान स्वतंत्र होता तो अमरीका को अफगानिस्तान में लाभ हो सकता था। भारत नियंत्रित गिलगित-बाल्तिस्तान अमरीका के नंबर एक प्रतिद्वंद्वी चीन और उसकी बैल्ट और सड़कों की पहल के लिए एक बड़ा झटका होता। लैंसिया ने कहा कि यदि बलूचिस्तान एक स्वतंत्र देश होता तो अमरीका पाकिस्तान पर निर्भर रहने की बजाय अफगानिस्तान में अमरीकी सेना की आपूर्ति के लिए इसका इस्तेमाल कर सकता था।

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