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जालन्धर, (जसमीत) : 15 साल बाद टीम इंडिया को जूनियर वल्र्ड हॉकी कप दिलाने वाले हरजीत सिंह तुली के घर वाले नहीं चाहते थे कि वह कभी हॉकी खेलें। इसके पीछे एक वजह सिर्फ यह थी कि पिता रामपाल सिंह जोकि पेशे से ट्रक ड्राइवर थे, ट्रेङ्क्षनग का खर्च उठाने में असमर्थ थे। हरजीत हॉकी खेलना भूल भी जाते अगर इलाके में उन दिनों एक अकादमी न खुल गई होती।


पंजाब केसरी ऑफिस पहुंचे हरजीत ने ये बातें तब कहीं जब वह अपनी जिंदगी के संघर्ष, कामयाबी के बाद आई मुश्किलें संबंधी बातचीत कर रहे थे। हरजीत बताते हैं कि उन्होंने बचपन में जब घरवालों का बताया कि वह हॉकी में करियर बनाना चाहते हैं तो उन्होंने आॢथक हालात ठीक न होने के कारण पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहा था। मैंने हॉकी खेलनी थी इसलिए घरवालों को बिना बताए अकादमी पहुंच गया।

अकादमी में ही मेरी हॉकी किट पड़ी होती थी। प्रैक्टिस के बाद कपड़े बदलकर घर पहुंच जाता था ताकि किसी को कोई शक न हो। एक समय ऐसा भी आया जब प्लेयर होने के कारण मेरे पोस्टर जगह-जगह लगते थे। यह खुशी देने वाला अहसास होता है जब आपकी उम्र कम होती है। लेकिन मैं उन दिनों काफी डरता था। मुझे डर था कि कहीं घरवालों को इस बाबत पता न चल जाए कि मैं हॉकी खेलता हूं। अगर ऐसा हो जाता तो वह हॉकी खेलने से मुझे रोक सकते थे।हॉकी खेलता हूं। अगर ऐसा हो जाता तो वह हॉकी खेलने से मुझे रोक सकते थे। 
फोटो की वजह से बनी बायोपिक, सपना था ट्रॉफी के साथ सोना
 

हरजीत ने बेबाकी से कहा। 22 साल की उम्र में ही मेरी जिंदगी पर बायोपिक बनी। शायद इसके पीछे सबसे बड़ा रोल मेरी उस फोटो का था जो जूनियर एशिया कप जीतने के बाद मेरे बैडरूम में ट्रॉफी के साथ खींची गई थी। हरजीत ने बताया कि जूनियर विश्व जीतना हमारा सपना था। हमने 3 साल तक इसके लिए कड़ी मेहनत की थी। हमारे कोच कहते थे कि विजेता ट्रॉफी को साथ लेकर सोने का अलग ही मजा है। मेरे जेहन में यह बात थी इसलिए मैं ट्रॉफी को साथ पकड़े सो गया। वह तो मेरे साथी ने फोटो खींच ली तो यह वायरल हो गई। असल में ऐसा कुछ भी बाहर आने वाला नहीं था।
अकादमी से मिलती हॉकी किट ने खींचा ध्यान
हरजीत ने बताया कि हॉकी से उनकी नजदीकियां बहुत छोटी उम्र में हो गई थी। दरअसल उनके इलाके में हॉकी अकादमी खुली थी। इसमें दाखिला लेने वाले बच्चों को हॉकी किट दी जाती थी। बकौल हरजीत-पहले पहल उन्होंने सिर्फ हॉकी किट लेने के लिए अकादमी में दाखिला लिया। लेकिन जैसे-जैसे वह हॉकी खेलते गए उनका इस खेल के प्रति प्यार बढ़ता गया।
अति-आत्मविश्वास ले डूबा
एशियन गेम्स के लीग दौरे में भारतीय हॉकी टीम ने 76 गोल किए लेकिन सैमीफाइनल में वह हार गई। हरजीत के मुताबिक भारतीय खिलाडिय़ों को अति-आत्मविश्वास ले डूबा।
हॉकी विश्व कप में कोच हरेन्द्रा से होंगी उम्मीदें
 

हरजीत का कहना हैै कि हॉकी विश्व कप आने वाला है। इसमें भारतीय टीम का दावा सबसे मजबूत नजर आ रहा है। हमारी हॉकी कुछ समय से बेहतर हुई है। वैसे भी कोच हरेंद्रा सिंह अच्छे रिजल्ट लाने में सक्षम हैं। वह ऐसे समय में उभरे हैं जब हॉकी टीम के लिए विदेशी कोच की जरूरत समझी जाती थी। उन्होंने अपने प्रदर्शन से प्रभावित किया है।
एस्ट्रोटर्फ पर हों मैच
हरजीत ने कहा कि हॉकी की बेहतरी के लिए इसे स्कूल स्तर पर प्रयास करने होंगे। हमारे ज्यादातर स्कूल में घास की ग्राऊंड हैं। अगर अच्छे हॉकी प्लेयर बनाने हैं तो एस्ट्रोटर्फ पर प्रैक्टिस जरूरी है। अगर बच्चे घास के मैदान में ही खेलने आ रहे हैं तो उन्हें इंटरनैशनल मैचों के लिए एक बार फिर से मेहनत करनी पड़ेगी जोकि मुश्किल होती है।

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