नई दिल्ली : भारत लंबे समय से फुटबॉल को विकसित करने के सही फॉर्मूले की तलाश में है। पिछले कुछ सालों में कई अकादमियां, लीग, विदेशी पार्टनरशिप और पाथवे प्रोग्राम शुरू के बावजूद निरंतरता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हाल ही में जर्मनी की यात्रा के दौरान NDTV ने प्रमुख फुटबॉल क्लब बायर्न म्यूनिख की विश्व-प्रसिद्ध अकादमी का दौरा किया और बायर्न कैंपस के डायरेक्टर जोचेन सॉयर से जमीन से जुड़कर एक सफल फुटबॉल सिस्टम का ब्लूप्रिंट जाना।
सॉयर ने माना कि उन्हें भारतीय फुटबॉल की गहरी जानकारी नहीं है और इस बात पर जोर दिया कि देश के पास पहले से ही एक जरूरी चीज मौजूद है और वो है खेल के प्रति सच्चा जुनून। सॉयर के अनुसार बड़ी चुनौतियां एक स्पष्ट विकास ढांचा तैयार करने, बेहतरीन कोच तैयार करने और सबसे जरूरी बात, एक लंबी अवधि की रणनीति को नतीजे देने के लिए पर्याप्त समय देने में हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत को बुनियादी बातों पर ध्यान देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खेल में रुचि रखने वाले युवाओं को खेलने के भरपूर मौके मिलें।
सवाल : भारत जैसा देश बायर्न कैंपस से क्या सीख सकता है?
जोचेन सॉयर : मेरे लिए इसका जवाब देना मुश्किल है क्योंकि मैं भारतीय फुटबॉल की बारीकियों में ज्यादा शामिल नहीं रहा हूं। लेकिन मेरा मानना है कि भारतीय लोग आम तौर पर खेल के प्रति बहुत समर्पित हैं, और इससे पहले से ही मदद मिलती है। भारत एक ऐसा देश भी है जिसने पिछले कुछ दशकों में बहुत तेजी से तरक्की की है।
अगर आप किसी खेल को उच्चतम स्तर पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, तो सबसे जरूरी चीज ढांचा है। देश को यह सोचना होगा कि फुटबॉल का ढांचा कैसा होना चाहिए। लीग सिस्टम क्या है? युवा सिस्टम क्या है? हम कैसे बेहतरीन टैलेंट को उच्चतम स्तर पर एक-दूसरे के खिलाफ मुकाबला करने के लिए ला सकते हैं? सबसे जरूरी बात एक ढांचा खोजना है।
सवाल : निरंतरता कितनी जरूरी ?
जोचेन सॉयर : आपके पास एक स्पष्ट योजना होनी चाहिए और कम से कम 10 साल तक उस पर अमल करना चाहिए। मुझे चीन में दो-तीन अकादमियां खोलने या उनके साथ सहयोग करने का कुछ अनुभव है। वहां हमेशा रणनीति बदलने, युवा सिस्टम रखने या न रखने, अकादमियों को टॉप क्लबों से जोड़ने, फिर उन्हें यूनिवर्सिटी से जोड़ने और बार-बार बदलाव करने पर चर्चा होती रहती थी।
मुझे लगता है कि यह सबसे बड़ी गलती है जो आप कर सकते हैं। आपके पास एक ढांचा और स्पष्ट योजना होनी चाहिए और कम से कम 10 साल तक उस योजना पर अमल करना चाहिए। युवाओं के विकास में हमेशा समय लगता है।
सवाल : बायर्न का कोई उदाहरण दे ?
जोचेन सॉयर : बायर्न म्यूनिख के सुपरवाइजरी बोर्ड के सदस्य उली होनेस ने कैंपस शुरू होने के दो साल बाद ही पूछा था: 'टॉप टैलेंट कहां हैं?' मैंने उनसे कहा, 'उली, मुझसे 5 साल बाद पूछना।' हम 11 और 12 साल के बच्चों की बात कर रहे थे। अगर आप जानना चाहते हैं कि वे कितने अच्छे हैं, तो मुझसे 5 साल बाद पूछिए, जब वे 17 या 18 साल के हो जाएंगे, तब मैं इस सवाल का जवाब दे पाऊंगा।
किसी देश के लिए भी ऐसा ही है। अगर आप कुछ बनाना चाहते हैं, तो एक रणनीति और प्लान बनाएं और कम से कम 10 साल तक उस पर टिके रहें। तब आप देख सकते हैं कि यह काम करता है या नहीं और चीजों को बदलने के बारे में सोच सकते हैं।
सवाल : शुरुआत से शुरू करे तो भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता क्या हो?
जोचेन सॉयर : निश्चित रूप से सबसे कम उम्र के खिलाड़ियों के साथ काम करना। सबसे कम उम्र के खिलाड़ियों के साथ काम करने का मतलब है कि उन्हें फुटबॉल खेलना सीखना होगा। आप अफ्रीका के युवा खिलाड़ियों को देख सकते हैं। वे स्कूल जाते हैं, लेकिन जैसे ही उनके पैरों में गेंद आती है, वे उससे खेलने लगते हैं। कभी-कभी एकेडमी में स्ट्रक्चर, खिलाड़ियों के शारीरिक विकास, एथलेटिक्स पर ध्यान देने जैसी चीजों पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाता है। मुझे लगता है कि यह पूरी तरह से गलत है। खेल तो खेल है। खेल गेंद से खेला जाता है। आपको उन बच्चों को गेंद देनी होगी। जैसे ही वे गेंद के साथ ट्रेनिंग कर पाते हैं, वे खुशकिस्मत और खुश महसूस करते हैं और मजा करते हैं। सबसे जरूरी बात यही है: खेल को खेलने की कोशिश करना।
सवाल : क्या भारत में पहले से ही प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ी हैं?
जोचेन सॉयर: हां। हमने कुछ भारतीय खिलाड़ियों को अपने यूथ प्रोजेक्ट्स, जैसे यूथ कप, वर्ल्ड स्क्वाड और ग्लोबल एकेडमी में शामिल किया है। आप देख सकते हैं कि क्वालिटी 10 या 15 साल पहले की तुलना में अब ऊंचे स्तर पर है। मुझे लगता है कि इसी रास्ते पर आगे बढ़ते रहने की जरूरत है।
सवाल : भारत जर्मन एकेडमी सिस्टम से क्या सीख सकता है?
जोचेन सॉयर : मेरा अब भी मानना है कि जर्मनी में यूथ एकेडमी का स्ट्रक्चर यूरोप में सबसे अच्छे स्ट्रक्चर में से एक है। भारत इससे बहुत कुछ सीख सकता है। मैं कहूंगा कि जर्मनी में यूथ अकादमियों में हम जो काम कर रहे हैं, उसका 80 प्रतिशत हिस्सा बहुत ऊंचे स्तर का है। लेकिन हमें बदलाव भी करने होंगे। हमें सिर्फ डेटा इकट्ठा करने, एथलेटिक पहलुओं या टैक्टिकल पहलुओं पर ध्यान देने के बजाय खिलाड़ियों और फुटबॉल पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। असल बात व्यक्तिगत फुटबॉल कौशल की है।
सवाल : भारतीय फुटबॉल के लिए आपकी सलाह ?
जोचेन सॉयर : मैं हमेशा देशों को यही सलाह दूंगा कि वे खेल के मूल स्वरूप पर ध्यान दें और बेहतरीन कोचों को नियुक्त करें। कोचों की गुणवत्ता शायद सबसे महत्वपूर्ण चीज है और कभी-कभी यूरोपीय फुटबॉल में भी इसे कम करके आंका जाता है। आपको ऐसे कोचों की जरूरत है जो उन्हें यह समझना होगा कि उन्हें खेल पर ध्यान देना है, न कि फुटबॉल खिलाड़ी से जुड़ी बाकी चीजों पर। भारत के लिए मुझे लगता है कि एक साफ-सुथरा ढांचा बनाना, बेहतरीन कोच तैयार करना, युवा खिलाड़ियों को फुटबॉल खेलने का मौका देना और फिर कई सालों तक उस योजना पर टिके रहने का धैर्य रखना जरूरी है।